पद 2
सूर्य-स्तुति · पद 2 / 279
दीन-दयालु दिवाकर देवा। कर मुनि,मनुज,सुरासुर सेवा ॥ 1 ॥
हिम-तम-करि केहरि करमाली। दहन दोष-दुख-दुरित-रुजाली ॥ 2 ॥
कोक-कोकनद-लोक-प्रकासी। तेज-प्रताप-रूप-रस-रासी ॥ 3 ॥
सारथि-पंगु,दिब्य रथ-गामी। हरि-संकर-बिधि-मूरति स्वामी ॥ 4 ॥
बेद पुरान प्रगट जस जागै। तुलसी राम-भगति बर माँगै ॥ 5 ॥