श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २०१

श्रीराम-स्तुति · पद २०१ / २७९

लाभ कहा मानुष-तनु पाये।

काय-बचन-मन सपनेहुँ कबहुँक घटत न काज पराये ॥ १ ॥

जो सुख सुरपुर-नरक, गेह-बन आवत बिनहिं बुलाये।

तेहि सुख कहँ बहु जतन करत मन, समुझत नहिं समुझाये ॥ २ ॥

पर-दारा, परद्रोह, मोहबस किये मूढ़ मन भाये।

गरभबास दुखरासि जातना तीब्र बिपति बिसराये ॥ ३ ॥

भय-निद्रा, मैथुन-अहार, सबके समान जग जाये।

सुर-दुरलभ तनु धरि न भजे हरि मद अभिमान गवाँये ॥ ४ ॥

गई न निज-पर-बुद्धि सुद्ध ह्वे रहे न राम-लय लाये।

तुलसिदास यह अवसर बीते का पुनि के पछिताये ॥ ५ ॥