श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २०९

श्रीराम-स्तुति · पद २०९ / २७९

नाहिनै नाथ! अवलंब मोहि आनकी।

करम-मन-बचन पन सत्य करुनानिधे!

एक। गति राम! भवदीय पदत्रानकी ॥ १ ॥

कोह-मद-मोह-ममतायतन जानि मन,

बात नहि जाति कहि ग्यान-बिग्यानकी।

काम-संकलप उर निरखि बहु बासनहिं,

आस नहिं एकहू आँक निरबानकी ॥ २ ॥

बेद-बोधित करम धरम बिनु अगम अति,

जदपि जिय लालसा अमरपुर जानकी।

सिद्ध-सुर-मनुज दनुजादिसेवत कठिन,

द्रवहिं हठजोग दिये भोग बलि प्रानकी ॥ ३ ॥

भगति दुरलभ परम, संभु-सुक-मुनि-मधुप,

प्यास पदकंज-मकरंद-मधुपानकी।

पतित-पावन सुनत नाम बिस्रामकृत,

भ्रमित पुनि समझि चित ग्रंथि अभिमानकी ॥ ४ ॥

नरक-अधिकार मम घोर संसार-तमकूपकहीं, भूप! मोहि सक्ति आपानकी।

दासतुलसी सोउ त्रास नहि गनत मन,

सुमिरि गुह गीध गज ग्याति हनुमानकी ॥ ५ ॥