श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २१०

श्रीराम-स्तुति · पद २१० / २७९

औरु कहँ ठौरु रघुबंस-मनि! मेरे।

पतित-पावन प्रनत-पाल असरन-सरन,

बाँकुरे बिरुद बिरुदैत केहि केरे ॥ १ ॥

समुझि जिय दोस अति रोस करि राम जो,

करत नहिं कान बिनती बदन फेरे।

तदपि ह्वे निडर हौं कहौं करुना-सिंधु,

क्योंऽब रहि जात सुनि बात बिनु हेरे ॥ २ ॥

मुख्य रुचि बसिबेकी पुर रावरे,

राम! तेहि रुचिहि कामादि गन घेरे।

अगम अपबरग, अरु सरग सुकृतैकफल,

नाम-बल क्यों बसौं जम-नगर नेरे ॥ ३ ॥

कतहुँ नहिं ठाउँ, कहँ जाउँ कोसलनाथ!

दीन बितहीन हौं, बिकल बिनु डेरे।

दास तुलसिहि बास देहु अब करि कृपा,

बसत गज गीध ब्याधादि जेहि खेरे ॥ ४ ॥