श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २११

श्रीराम-स्तुति · पद २११ / २७९

कबहुँ रघुबंसमनि ! सो कृपा करहुगे।

जेहि कृपा ब्याध, गज, बिप्र, खल नर तरे,

तिन्हहि सम मानि मोहि नाथ उद्धरहुगे ॥ १ ॥

जोनि बहु जनमि किये करम खल बिबिध बिधि,

अधम आचरन कछु हृदय नहि धरहुगे।

दीनहित! अजित सरबग्य समरथ प्रनतपालि,

चित मृदुल निज गुननि अनुसरहुगे ॥ २ ॥

मोह-मद-मान-कामादि खलमंडली,

सकुल निरमूल करि दुसह दुख हरहुगे।

जोग-जप-जग्य-बिग्यान ते अधिक अति,

अमल दृढ़ भगति दै परम सुख भरहुगे ॥ ३ ॥

मंदजन-मौलिमनि सकल, साधनहीन,

कुटिल मन, मलिन जिय जानि जो डरहुगे।

दासतुलसी बेद-बिदित बिरुदावली,

बिमल जस नाथ! केहि भाँति बिस्तरहुगे ॥ ४ ॥