पद 213
श्रीराम-स्तुति · पद 213 / 279
हरि-सम आपदा-हरन।
नहि कोउ सहज कृपालु दुसह दुख-सागर-तरन ॥ 1 ॥
गज निज बल अवलोकि कमल गहि गयो सरन।
दीन बचन सुनि चले गरुड़ तजि सुनाभ-धरन ॥ 2 ॥
द्रुपदसुताको लग्यो दुसासन नगन करन।
’हा हरि पाहि’ कहत पूरे पट बिबिध बरन ॥ 3 ॥
इहे जानि सुर-नर-मुनि-कोबिद सेवत चरन।
तुलसिदास प्रभु को न अभय कियो नृग-उद्धरन ॥ 4 ॥