श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 213

हरि-सम आपदा-हरन।

नहि कोउ सहज कृपालु दुसह दुख-सागर-तरन ॥ 1 ॥

गज निज बल अवलोकि कमल गहि गयो सरन।

दीन बचन सुनि चले गरुड़ तजि सुनाभ-धरन ॥ 2 ॥

द्रुपदसुताको लग्यो दुसासन नगन करन।

’हा हरि पाहि’ कहत पूरे पट बिबिध बरन ॥ 3 ॥

इहे जानि सुर-नर-मुनि-कोबिद सेवत चरन।

तुलसिदास प्रभु को न अभय कियो नृग-उद्धरन ॥ 4 ॥