पद 219
श्रीराम-स्तुति · पद 219 / 279
द्वार हौं भोर ही को आजु।
रटत रिरिहा आरि और न, कौर ही तें काजु ॥ 1 ॥
कलि कराल दुकाल दारुन, सब कुभाँति कुसाजु।
नीच जन, मन ऊँच जैसी कोढँमेंकी खाजु ॥ 2 ॥
हहरि हियमें सदय बूझ्यो जाइ साधु-समाजु।
मोहुसे कहुँ कतहुँ कोउ, तिन्ह कह्यो कोसलराजु ॥ 3 ॥
दीनता-दारिद दलै को कृपाबारिधि बाजु।
दानि दसरथरायके , तू बानइत सिरताजु ॥ 4 ॥
जनमको भूखो भिखारी हौं गरीबनिवाजु।
पेट भरि तुलसिहि जेंवाइय भगति-सुधा सुनाजु ॥ 5 ॥