श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 219

द्वार हौं भोर ही को आजु।

रटत रिरिहा आरि और न, कौर ही तें काजु ॥ 1 ॥

कलि कराल दुकाल दारुन, सब कुभाँति कुसाजु।

नीच जन, मन ऊँच जैसी कोढँमेंकी खाजु ॥ 2 ॥

हहरि हियमें सदय बूझ्यो जाइ साधु-समाजु।

मोहुसे कहुँ कतहुँ कोउ, तिन्ह कह्यो कोसलराजु ॥ 3 ॥

दीनता-दारिद दलै को कृपाबारिधि बाजु।

दानि दसरथरायके , तू बानइत सिरताजु ॥ 4 ॥

जनमको भूखो भिखारी हौं गरीबनिवाजु।

पेट भरि तुलसिहि जेंवाइय भगति-सुधा सुनाजु ॥ 5 ॥