श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २२०

श्रीराम-स्तुति · पद २२० / २७९

करिय सँभार, कोसलराय!

और ठौर न और गति, अवलंब नाम बिहाय ॥ १ ॥

बूझि अपनी आपनो हितु आप बाप न माय।

राम! राउर नाम गुर,सुर,स्वामि,सखा,सहाय ॥ २ ॥

रामराज न चले मानस-मलिनके छल छाय।

कोप तेहि कलिकाल कायर मुएहि घालत घाय ॥ ३ ॥

लेत केहरिको बयर ज्यों भैक हनि गोमाय।

त्योंहि राम-गुलाम जानि निकाम देत कुदाय ॥ ४ ॥

अकनि याके कपट-करतब, अमित अनय-अपाय।

सुखि हरिपुर बसत होत परीछितहि पछिताय ॥ ५ ॥

कृपासिंधु! बिलोकिये, जन-मनकी साँसति साय।

सरन आयो, देव! दीनदयालु! देखन पाय ॥ ६ ॥

निकट बोलि न बरजिये, बलि जाउँ, हनिय न हाय।

देखिहैं हनुमान गोमुख नाहरनिके न्याय ॥ ७ ॥

अरुन मुख, भ्रू बिकट, पिंगल नयन रोष-कषाय।

बीर सुमिरि समीरको घटिहै चपल चित चाय ॥ ८ ॥

बिनय सुनि बिहँसे अनुजसों बचनके कहि भाय।

’भली कही’ कह्यो लषन हूँ हँसि,बने सकल बनाय ॥ ९ ॥

दई दीनहिं दादि, सो सुनि सुजन-सदन बधाय।

मिटे संकट-सोच, पोच-प्रपंच, पाप-निकाय ॥ १० ॥

पेखि प्रीति-प्रतीति जनपर अगुन अनघ अमाय।

दासतुलसी कहत मुनिगन,’जयति जय उरुगाय’ ॥ ११ ॥