श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २२

काशी-स्तुति · राग भैरव · पद २२ / २७९

सेइअ सहित सनेह देह भरि, कामधेनु कलि कासी।

समनि सोक-संताप-पाप-रुज,सकल-सुमंगल-रासी ॥ १ ॥

मरजादा चहुँओर चरनबर,सेवत सुरपुर-बासी।

तीरथ सब सुभ अंग रोम सिवलिंग अमित अबिनासी ॥ २ ॥

अंतराइन ऐन भल,थन फल, बच्छ बेद-बिस्वासी।

गलकंबल बरुना बिभाति जनु,लूम लसति,सरिताऽसी ॥ ३ ॥

दंडपानि भैरव बिषान, मलरुचि-खलगन-भयदा-सी।

लोलदिनेस त्रिलोचन लोचन,करनघंट घंटा-सी ॥ ४ ॥

मनिकर्निका बदन-ससि सुंदर,सुरसरि-सुख सुखमा-सी।

स्वारथ परमारथ परिपूरन,पंचकोसि महिमा-सी ॥ ५ ॥

बिस्वनाथ पालक कृपालुचित,लालति नित गिरिजा-सी।

सिद्धि सची, सारद पूजहिं मन जोगवति रहति रमा-सी ॥ ६ ॥

पंचाच्छरी प्रान,मुद माधव,गब्य सुपंचनदा-सी।

ब्रह्म-जीव-सम रामनाम जुग,आखर बिस्व बिकासी ॥ ७ ॥

चारितु चरति करम कुकरम करि,मरत जीवगन घासी।

लहत परमपद पय पावन ,जेहि चहत प्रपंच-उदासी ॥ ८ ॥

कहत पुरान रची केसव निज कर-करतूति कला-सी।

तुलसी बसि हरपुरी राम जपु,जो भयो चहै सुपासी ॥ ९ ॥