श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २२१

श्रीराम-स्तुति · पद २२१ / २७९

नाथ! कृपाहीको पंथ चितवत दीन हौं दिनराति।

होइ धौं केहि काल दीनदयालु! जानि न जाति ॥ १ ॥

सुगुन, ग्यान-बिराग-भगति, सु-साधननिकी पाँति।

भजे बिकल बिलोकि कलि अघ-अवगुननिकी थाति ॥ २ ॥

अति अनीति-कुरीति भइ भुइँ तरनि हू ते ताति।

जाउँ कहँ ? बलि जाउँ, कहूँ न ठाउँ, मति अकुलाति ॥ ३ ॥

आप सहित न आपनो कोउ, बाप! कठिन कुभाँति।

स्यामघन! सींचिये तुलसी, सालि सफल सुखाति ॥ ४ ॥