श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २२२

श्रीराम-स्तुति · पद २२२ / २७९

बलि जाउँ, और कासों कहौं ?

सदगुनसिंधु स्वामि सेवक-हित कहुँ न कृपानिधि-सो लहौं ॥ १ ॥

जहँ जहँ लोभ लोल लालचबस निजहित चित चाहनि चहौं।

तहँ तहँ तरनि तकत उलूक ज्यों भटकि कुतरु-कोटर गहौं ॥ २ ॥

काल-सुभाउ-करम बिचित्र फलदायक सुनि सिर धुनि रहौं।

मोको तौ सकल सदा एकहि रस दुसह दाह दारुन दहौं ॥ ३ ॥

उचित अनाथ होइ दुखभाजन भयो नाथ! किंकर न हौं।

अब रावरो कहाइ न बूझिये, सरनपाल! साँसति सहौं ॥ ४ ॥

महाराज! राजीवबिलोचन! मगन-पाप-संताप हौं।

तुलसी प्रभु!जब तब जेहि तेहि बिधि राम निरबहौं ॥ ५ ॥