श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 224

रघुबरहि कबहुँ मन लागिहै ?

कुपथ,कुचाल,कुमति,कुमनोरथ, कुटिल कपट कब त्यागिहै ॥ 1 ॥

जानत गरल अमिय बिमोहबस, अमिय गनत करि आगिहै।

उलटी रीति-प्रीति अपनेकी तजि प्रभुपद अनुरागिहै ॥ 2 ॥

आखर अरथ मंजु मृदु मोदक राम-प्रेम-पगि पागिहै।

ऐसे गुन गाइ रिझाइ स्वामिसों पाइहै जो मुँह माँगिहै ॥ 3 ॥

तू यहि बिधि सुख-सयन सोइहै,जियकी जरनि भूरि भागिहै।

राम-प्रसाद दासतुलसी उर राम-भगति-जोग जागिहै ॥ 4 ॥