श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 225

भरोसो और आइहै उर ताके।

कै कहुँ लहै जो रामहि-सो साहिब, कै अपनो बल जाके ॥ 1 ॥

के कलिकाल कराल न सूझत, मोह-मार-मद छाके।

कै सुनि स्वामि-सुभाउ न रह्यो चित, जो हित सब अँग थाके ॥ 2 ॥

हौं जानत भलिभाँति अपनपौ, प्रभु-सो सुन्यो न साके।

उपल,भील,खग,मृग रजनीचर, भले भये करतब काके ॥ 3 ॥

मोको भलो राम-नाम सुरतरु-सो, रामप्रसाद कृपालु कृपाके।

तुलसी सुखी निसोच राज ज्यों बालक माय-बबाके ॥ 4 ॥