श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २२६

श्रीराम-स्तुति · पद २२६ / २७९

भरोसो जाहि दूसरो सो करो।

मोको तो रामको नाम कलपतरु कलि कल्यान फरो ॥ १ ॥

करम उपासन,ग्यान,बेदमत, सो सब भाँति खरो।

मोहि तो ’सावनके अंधहि’ ज्यों सूझत रंग हरों ॥ २ ॥

चाटत रह्यो स्वान पातरि ज्यों कबहुँ न पेट भरो।

सो हौं सुमिरत नाम-सुधारस पेखत परुसि धरो ॥ ३ ॥

स्वारथ औ परमारथ हू को नहि कुंजरो-नरो।

सुनियत सेतु पयोध पषाननि करि कपि कटक-तरो ॥ ४ ॥

प्रीति-प्रतीति जहाँ जाकी, तहँ ताको काज सरो।

मेरे तो माय-बाप दोउ आखर हौं सिसु-अरनि अरो ॥ ५ ॥

संकर साखि जो राखि कहौं कछु तौ जरि जीह गरो।

अपनो भलो राम-नामहि ते तुलसिहि समुझि परो ॥ ६ ॥