श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 227

नाम राम रावरोई हित मेरे।

स्वारथ-परमारथ साथिन्ह सों भुज उठाइ कहौं टेरे ॥ 1 ॥

जननि-जनक तज्यो जनमि, करम बिनु बिधिहु सृज्यो अवडेरे।

मोहुँसो कोउ-कोउ कहत रामहि को, सो प्रसंग केहि केरे ॥ 32 ॥

फिर्यौ ललात बिनु नाम उदर लगि, दुखउ दुखित मोहि हेरे।

नाम-प्रसाद लहत रसाल फल अब हौं बबुर बहेरे ॥ 3 ॥

साधत साधु लोक-परलोकहि,सुनि गुनि जतन घनेरे।

तुलसीके अवलंब नामको, एक गाँठि कइ फेरे ॥ 4 ॥