श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २३१

श्रीराम-स्तुति · पद २३१ / २७९

और मोहि को है, काहि कहिहौं ?

रंक-राज ज्यों मनको मनोरथ, केहि सुनाइ सुख लहिहौं ॥ १ ॥

जम-जातना,जोनि-संकट सब सहे दुसह अरु सहिहौं।

मोको अगम,सुगम तुमको प्रभु, तउ फल चारि न चहिहौं ॥ २ ॥

खेलिबेको खग-मृग,तरु-कंकर है रावरो राम हौं रहिहौं।

यहि नाते नरकहुँ सचु या बिनु परमपदहुँ दुख दहिहौं ॥ ३ ॥

इतनी जिय लालसा दासके , कहत पानही गहिहौं।

दीजै बचन कि हृदय आनिये ’तुलसिको पन निर्बहिहौ’ ॥ ४ ॥