श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 231

और मोहि को है, काहि कहिहौं ?

रंक-राज ज्यों मनको मनोरथ, केहि सुनाइ सुख लहिहौं ॥ 1 ॥

जम-जातना,जोनि-संकट सब सहे दुसह अरु सहिहौं।

मोको अगम,सुगम तुमको प्रभु, तउ फल चारि न चहिहौं ॥ 2 ॥

खेलिबेको खग-मृग,तरु-कंकर है रावरो राम हौं रहिहौं।

यहि नाते नरकहुँ सचु या बिनु परमपदहुँ दुख दहिहौं ॥ 3 ॥

इतनी जिय लालसा दासके , कहत पानही गहिहौं।

दीजै बचन कि हृदय आनिये ’तुलसिको पन निर्बहिहौ’ ॥ 4 ॥