श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २३२

श्रीराम-स्तुति · पद २३२ / २७९

दीनबंधु दूसरो कहँ पावो ?

को तुम बिनु पर-पीर पाइ है ? केहि दीनता सुनावों ॥ १ ॥

प्रभु अकृपालु,कृपालु अलायक, जहँ-जहँ चितहिं डोलावों।

इहै समुझि सुनि रहौं मौन ही, कहि भ्रम कहा गवावों ॥ २ ॥

गोपद बुड़िबे जोग करम करौं, बातनि जलधि थहावों।

अति लालची,काम-किंकर मन, मुख रावरो कहावों ॥ ३ ॥

तुलसी प्रभु जियकी जानत सब, अपनो कछुक जनावों।

सो कीजै,जेहि भाँति छाँडि छल द्वार परो गुन गावों ॥ ४ ॥