श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २३३

श्रीराम-स्तुति · पद २३३ / २७९

मनोरथ मनको एकै भाँति।

चाहत मुनि-मन-अगम सुकृत-फल, मनसा अघ न अघाति ॥ १ ॥

करमभूमि कलि जनम,कुसंगति, मति बिमोह-मद-माति।

करत कुजोग कोटि, कयों पैयत परमारथ-पद सांति ॥ २ ॥

सेइ साधु-गुरु,सुनि पुरान-श्रुति बूझ्यो राग बाजी ताँति।

तुलसी प्रभु सुभाउ सुरतरु-सो, ज्यों दरपन मुख-कांति ॥ ३ ॥