श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 234

जनम गयो बादिहिं बर बीति।

परमारथ पाले न पर्यो कछु, अनुदिन अधिक अनीति ॥ 1 ॥

खेलत खात लरिकपन गो चलि, जौबन जुवतिन लियो जीति।

रोग-बियोग-सोग-श्रम-संकुल बड़ि बय बृथहि अतीति ॥ 2 ॥

राग-रोष-इरिषा-बिमोह-बस रुची न साधु-समीति।

कहे न सुने गुनगन रघुबरके , भइ न रामपद-प्रीति ॥ 3 ॥

हृदय दहत पछिताय-अनल अब, सुनत दुसह भवभीति।

तुलसी प्रभु तें होइ सो कीजिय समुझि बिरदकी रीति ॥ 4 ॥