पद २३४
श्रीराम-स्तुति · पद २३४ / २७९
जनम गयो बादिहिं बर बीति।
परमारथ पाले न पर्यो कछु, अनुदिन अधिक अनीति ॥ १ ॥
खेलत खात लरिकपन गो चलि, जौबन जुवतिन लियो जीति।
रोग-बियोग-सोग-श्रम-संकुल बड़ि बय बृथहि अतीति ॥ २ ॥
राग-रोष-इरिषा-बिमोह-बस रुची न साधु-समीति।
कहे न सुने गुनगन रघुबरके , भइ न रामपद-प्रीति ॥ ३ ॥
हृदय दहत पछिताय-अनल अब, सुनत दुसह भवभीति।
तुलसी प्रभु तें होइ सो कीजिय समुझि बिरदकी रीति ॥ ४ ॥