श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 235

ऐसेहि जनम-समूह सिराने।

प्राननाथ रघुनाथ-से प्रभु तजि सेवत चरन बिराने ॥ 1 ॥

जे जड जीव कुटिल,कायर,खल, केवल कलिमल-साने।

सूखत बदन प्रसंसत तिन्ह कहँ, हरितें अधिक करि माने ॥ 2 ॥

सुख हित कोटि उपाय निरंतर करत न पायँ पिराने।

सदा मलीन पंथके जल ज्यो, कबहुँ न हृदय थिराने ॥ 3 ॥

यह दीनता दूर करिबेको अमित जतन उर आने।

तुलसी चित-चिंता न मिटै बिनु चिंतामनि पहिचाने ॥ 4 ॥