श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २३७

श्रीराम-स्तुति · पद २३७ / २७९

काहे न रसना, रामहि गावहि ?

निसदिन पर-अपवाद बृथा कत रटि-रटि राग बढ़ावहि ॥ १ ॥

नरमुख सुंदर मंदिर पावन बसि जनि ताहि लजावहि।

ससि समीप रहि त्यागि सुधा कत रबिकर-जल कहँ धावहि ॥ २ ॥

काम-कथा कलि-कैरव-चंदनि, सुनत श्रवन दै भावहि।

तिनहिं हटकि कहि हरि-कल-कीरति, करन कलंक नसावहि ॥ ३ ॥

जातरूप मति, जुगति रुचिर मनि रचि-रचि हार बनावहि।

सरन-सुखद रबिकुल-सरोज-रबि राम-नृपहि पहिरावहि ॥ ४ ॥

बाद-बिबाद, स्वाद तजि भजि हरि, सरस चरित चित लावहि।

तुलसिदास भव तरहि, तिहुँ पुर तू पुनीत जस पावहि ॥ ५ ॥