श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 238

आपनो हित रावरेसों जो पै सूझै।

तौ जनु तनुपर अछत सीस सुधि क्यों कबंध ज्यों जूझै ॥ 1 ॥

निज अवगुन,गुनराम! रावरे लखि-सुनि-मति-मन-रूझै।

रहनि-कहनि-समुझनि तुलसीकी को कृपालु बिनु बूझै ॥ 2 ॥