पद २३९
श्रीराम-स्तुति · पद २३९ / २७९
जाको हरि दृढ़ करि अंग कर्यो।
सोइ सुसील,पुनीत,बेदबिद, बिद्या-गुननि भर्यो ॥ १ ॥
उतपति पांडु-सुतनकी करनी सुनि सतपंथ डर्यो।
ते त्रैलोक्य-पूज्य, पावन जस सुनि-सुनि लोक तर्यो ॥ २ ॥
जो निज धरम बेदबोधित सो करत न कछु बिसर्यो।
बिनु अवगुन कृकलास कूप मज्जित कर गहि उधर्यो ॥ ३ ॥
ब्रह्म बिसिख ब्रह्मांड दहन छम गर्भ न नृपति जर्यो।
अजर-अमर, कुलिसहुँ नाहिंन बध, सो पुनि फेन मर्यो ॥ ४ ॥
बिप्र अजामिल अरु सुरपति तें कहा जो नहिं बिगर्यो।
उनको कियो सहाय बहुत, उरको संताप हर्यो ॥ ५ ॥
गनिका अरु कंदरपतें जगमहँ अघ न करत उबर्यो।
तिनको चरित पवित्र जानि हरि निज हृदि-भवन धर्यो ॥ ६ ॥
केहि आचरन भलो मानैं प्रभु सो तौ न जानि पर्यो।
तुलसिदास रघुनाथ-कृपाको जोवत पंथ खर्यो ॥ ७ ॥