श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २४०

श्रीराम-स्तुति · पद २४० / २७९

सोइ सुकृती,सुचि साँचो जाहि राम! तुम रीझे।

गनिका,गीध,बधिक हरिपुर गये, लै कासी प्रयाग कब सीझे ॥ १ ॥

कबहुँ न डग्यो निगम-मगतें पग, नृग जग जानि जिते दुख पाये।

गजधौं कौन दिछित, जाके सुमिरत लै सनाभ बाहन तजि धाये ॥ २ ॥

सुर-मुनि-बिप्र बिहाय बड़े कुल, गोकुल जनम गोपगृह लीन्हो।

बायों दियो बिभव कुरुपतिको, भोजन जाइ बिदुर-घर कीन्हो ॥ ३ ॥

मानत भलहि भलो भगतनितें, कछुक रीति पारथहि जनाई।

तुलसी सहज सनेह राम बस, और सबै जलकी चिकनाई ॥ ४ ॥