श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २४१

श्रीराम-स्तुति · पद २४१ / २७९

तब तुम मोहूसे सठनिको हठि गति न देते।

कैसेहु नाम लेइ कोउ पामर, सुनि सादर आगे ह्वे लेते ॥ १ ॥

पाप-खानि जिय जानि अजामिल जमगन तमकि तये ताको भे ते।

लियो छुड़ाइ, चले कर मींजत, पीसत दाँत गये रिस-रेते ॥ २ ॥

गौतम-तिय,गज,गीध,बिटप,कपि, हैं नाथहिं नीके मालुम जेते।

तिन्ह तिन्ह काजनि

————– साधु-समाजु तजि कृपासिंधु तब तब उठिगे ते ॥ ३ ॥

तिन्ह के काज

अजहुँ अधिक आदर येहि द्वारे, पतित पुनीत होत नहिं केते।

मेरे पासंगहु न पूहिहैं ,ह्वे गये,है, होने खल जेते ॥ ४ ॥

हौं अबलौं करतूति तिहारिय चितवत हुतो न रावरे चेते।

अब तुलसी पूतरो बाँधिहै, सहि न जात मोपै परिहास एते ॥ ५ ॥