श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २४२

श्रीराम-स्तुति · पद २४२ / २७९

तुम सम दींनबंधु,न दीन कोउ मो सम, सुनहु नृपति रघुराई।

मोसम कुटिल-मौलिमन नहिं जग, तुमसम हरि,!न हरन कुटिलाई ॥ १ ॥

हौं मन-बचन-कर्म पातक-रत, तुम कृपालु पतितन-गतिदाई।

हौं अनाथ, प्रभु! तुम अनाथ-हित, चित यहि सुरति कबहुँ नहिं जाई ॥ २ ॥

हौं आरत,आरति-नासक तुम, कीरति निगम पुराननि गाई।

हौं सभीत तुम हरन सकल भय, कारन कवन कृपा बिसराई ॥ ३ ॥

तुम सुखधाम राम श्रम-भंजन, हौं अति दुखित त्रिबिध श्रम पाई।

यह जिय जानि दास तुलसी कहँ राखहु सरन समुझि प्रभुताई ॥ ४ ॥