श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २४३

श्रीराम-स्तुति · पद २४३ / २७९

यहै जानि चरनन्हि चित लायो।

नाहिन नाथ! अकारनको हितु तुम समान पुरान-श्रुति गायो ॥ १ ॥

जननि जनक,सुत-दार, बंधुजन भये बहुत जहँ जहँ हौं जायो।

सब स्वारथहित प्रीति, कपट चित,काहू नहिं हरिभजन सिखायो ॥ २ ॥

सुर-मुनि,मनुज-दनुज,अहि-किन्नर, मैं तनु धरि सिर काहि न नायो।

जरत फिरत त्रयताप पापबस, काहु न हरि! करि कृपा जुड़ायो ॥ ३ ॥

जतन अनेक किये सुख-कारन, हरिपद-बिमुख सदा दुख पायो।

अब थाक्यो जलहीन नाव ज्यों देखत बिपति-जाल जग छायो ॥ ४ ॥

मो कहँ नाथ! बूझिये, यह गति सुख-निधान निज पति बिसरायो।

अब तजि रौष करहु करुना हरि! तुलसिदास सरनागत आयो ॥ ५ ॥