श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 244

याहि ते मैं हरि ग्यान गँवायो।

परिहरि हृदय-कमल रघुनाथहि, बाहर फिरत बिकल भयो धायो ॥ 1 ॥

ज्यों कुरंग निज अंग रुचिर मद अति मतिहीन मरम नहिं पायो।

खोजत गिरि,तरु,लता,भूमि, बिल परम सुगंध कहाँ तें आयो ॥ 2 ॥

ज्यों सर बिमल बारि परिपूरन, ऊपर कछु सिवार तृन छायो।

जारत हियो ताहि तजि हौं सठ, चाहत यहि बिधि तृषा बुझायो ॥ 3 ॥

ब्यापत त्रिबिध ताप तनु दारुन, तापर दुसह दरिद्र सतायो।

अपनेहि धाम नाम-सुरतरु तजि बिषय-बबूर-बाग मन लायो ॥ 4 ॥

तुम-सम ग्यान-निधान, मोहि सम मूढ़ न आन पुराननि गायो।

तुलसिदास प्रभु! यह बिचारि जिय कीजै नाथ उचित मन भायो ॥ 5 ॥