श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 245

मोहि मूढ़ मन बहुत बिगोयो।

याके लिये सुनहु करुनामय, मैं जग जनमि-जनमि दुख रोयो ॥ 1 ॥

सीतल मधुर पियूष सहज सुख निकटहि रहत दूरि जन खोयो।

बहु भाँतिन स्रम करत मोहबस, बृथहि मंदमति बारि बिलोयो ॥ 2 ॥

करम-कीच जिय जानि,सानि चित, चाहत कुटिल मलहि मल धोयो।

तृषावंत सुरसरि बिहाय सठ फिरि-फिरि बिकल अकास निचोयो ॥ 3 ॥

तुलसिदास प्रभु! कृपा करहु अब, मैं निज दोष कछू नहिं गोयो।

डासत ही गइ बीति निसा सब, कबहुँ न नाथ! नींद भरि सोयो ॥ 4 ॥