श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २४६

श्रीराम-स्तुति · पद २४६ / २७९

लोक-बेद हूँ बिदित बात सुनि-समुझि।

मोह-मोहित बिकल मति थिति न लहति।

छोटे -बड़े,खोटे -खरे, मोटेऊ दूबरे,

राम! रावरे निबाहे सबहीकी निबहति ॥ १ ॥

होती जो आपने बस, रहती एक ही रस,

दूनी न हरष-सोक-सांसति सहति।

चहतो जो जोई जोई, लहतो सो सोई सोई,

केहू भाँति काहूकी न लालसा रहति। ॥ २ ॥

करम,काल, सुभाउ गुन-दोष जीव जग मायाते,

सो सभै भौंह चकित चहति।

ईसन-दिगीसनि, जोगीसनि,मुनीसनि हू,

छोड़ति छोड़ाये तें,गहाये तें गहति ॥ ३ ॥

सतरंजको सो राज, काठको सबै समाज,

महाराज बाजी रची, प्रथम न हति।

तुलसी प्रभुके हाथ हारिबो-जीतिबो नाथ!

बहु बेष, बहु मुख सारदा कहति ॥ ४ ॥