श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २४७

श्रीराम-स्तुति · पद २४७ / २७९

राम जपु जीह! जानि, प्रीति सों प्रतीत मानि,

रामनाम जपे जैहै जियकी जरनि।

रामनामसों रहनि, रामनामकी कहनि,

कुटिल कलि-मल-सोक-संकट-हरनि ॥ १ ॥

रामनामको प्रभाउ पूजियत गनराउ,

कियो न दुराउ, कही आपनी करनि।

भव-सागरको सेतु, कासीहू सुगति हेतु,

जपत सादर संभु सहित घरनि ॥ २ ॥

बालमीकि ब्याध हे अगाध-अपराध-निधि,

’मरा’ ’मरा’ जपे पूजे मुनि अमरनि।

रोक्यो बिंध्य, सोख्यो सिंधु घटजहुँ नाम-बल,

हार्यो हिय,खारो भयो भूसुर-डरनि ॥ ३ ॥

नाम-महिमा अपार, सेष-सुक बार बार,

मति-अनुसार बुध बेदहू बरनि।

नामरति-कामधेनु तुलसीको कामतरु,

रामनाम है बिमोह-तिमिर-तरनि ॥ ४ ॥