श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २४८

श्रीराम-स्तुति · पद २४८ / २७९

पाहि,पाहि राम! पाहि रामभद्र, रामचंद्र!

सुजस स्रवन सुनि आयो हौं सरन।

दीनबंधु! दीनता-दरिद्र-दाह-दोष-दुख,

दारुन दुसह दर-दुरित-हरन ॥ १ ॥

जब जब जग-जाल ब्याकुल करम काल,

सब खल भूप भये भूतल-भरन।

तब तब तनु धरि, भूमि-भार दूरि करि,

थापे मुनि,सुर,साधु, आस्रम, बरन ॥ २ ॥

बेद,लोक,सब साखी, काहूकी रती न राखी,

रावनकी बंदि लागे अमर मरन।

ओक दै बिसोक किये लोकपति लोकनाथ,

रामराज भयो धरम चारिहु चरन ॥ ३ ॥

सिला,गुह,गीध,कपि,भील,भालु,रातिचर,

ख्याल ही कृपालु कीन्हे तारन-तरन।

पील-उद्धरन! सीलसिंधु! ढील देखियतु,

तुलसी पै चाहत गलानि ही गरन ॥ ४ ॥