श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २४९

श्रीराम-स्तुति · पद २४९ / २७९

भली भाँति पहिचाने-जाने साहिब जहाँ लौं जग,

जूड़े होत थोरे, थोरे ही गरम।

प्रीति न प्रवीन,नीतिहीन,रीतिके मलीन,

मायाधीन सब किये कालहू करम ॥ १ ॥

दानव-दनुज बड़े महामूढ़ मूँड़ चढ़े,

जीते लोकनाथ नाथ! बलनि भरम।

रीझि-रीझि दिये बर, खीझी-खीझि घाले घर,

आपने निवाजेकी न काहूको सरम ॥ २ ॥

सेवा-सावधान तू सुजान समरथ साँचो,

सदगुन-धाम राम! पावन परम।

सुरुख,सुमुख,एकरस,एकरूप,तोहि,

बिदित बिसेषि घटघटके मरम ॥ ३ ॥

तोसो नतपाल न कृपाल,न कँगाल मो-सो,

दयामें बसत देव सकल धरम।

राम कामतरु-छाँह चाहै रुचि मन माँह,

तुलसी बिकल,बलि, कलि-कुधरम ॥ ४ ॥