श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 251

राम! रावरो सुभाउ, गुन सील महिमा प्रभाउ,

जान्यो हर,हनुमान,लखन,भरत।

जिन्हके हिये-सुथरु राम-प्रेम-सुरतरु,

लसत सरस सुख फूलत फरत ॥ 1 ॥

आप माने स्वामी कै सखा सुभाइ भाइ,पति,

ते सनेह-सावधान रहत डरत।

साहिब-सेवक-रीति, प्रीति-परिमिति,नीति,

नेमको निबाह एक टेक न टरत ॥ 2 ॥

सुक-सनकादिक, प्रहलाद-नारदादि कहैं ,

रामकी भगति बड़ी बिरति-निरत।

जाने बिनु भगति न, जानिबो तिहारे हाथ,

समुझी सयाने नाथ! पगनि परत ॥ 3 ॥

छ-मत बिमत, न पुरान मत,एक मत,

नेति-नेति-नेति नित निगम करत।

औरनिकी कहा चली ? एकै बात भलै भली,

राम-नाम लिये तुलसी हू से तरत ॥ 4 ॥