श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २५२

श्रीराम-स्तुति · पद २५२ / २७९

बाप! आपने करत मेरी घनी घटि गई।

लालची लबारकी सुधारिये बारक,बलि,

रावरी भलाई सबहीकी भली भई ॥ १ ॥

रोगबस तनु, कुमनोरथ मलिन मनु,

पर-अपबाद मिथ्या-बाद बानी हई।

साधनकी ऐसी बिधि, साधन बिना न सिधि,

बिगरी बनावै कृपानिधिकी कृपा नई ॥ २ ॥

पतित-पावन, हित आरत-अनाथनिको,

निराधारको अधार,दीनबंधु,दई।

इन्हमें न एकौ भयो, बूझि न जूझ्यो न जयो,

ताहिते त्रिताप-तयो, लुनियत बई ॥ ३ ॥

स्वाँग सूधो साधुको, कुचालि कलितें अधिक,

परलोक फीकी मति, लोक-रंग-रई।

बड़े कुसमाज राज! आजुलौं जो पाये दिन,

महाराज! केहू भाँति नाम-ओट लईः ॥ ४ ॥

राम! नामको प्रताप जानियत नीके आप,

मोको गति दूसरी न बिधि निरमई।

खीझिबे लायक करतब कोटि कोटि कटु,

रीझिबे लायक तुलसीकी निलजई ॥ ५ ॥