श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 253

राम राखिये सरन, राखि आये सब दिन।

बिदित त्रिलोक तिहुँ काल न दयाल दूजो,

आरत-प्रनत-पाल को है प्रभु बिन ॥ 1 ॥

लाले पाले,पोषे तोषे आलसी-अभागी-अघी,

नाथ! पै अनाथनिसों भये न उरिन।

स्वामी समरथ ऐसो, हौं तिहारो जै सो. तैसो,

काल-चाल हेरि होति हिये घनी घिन ॥ 2 ॥

खीझि-रीझि,बिहँसि-अनख, क्यों हूँ एक बार,

’तुलसी तू मेरो’ बलि, कहियत किन?

जाहिं सूल निरमूल, होहिं सुख अनुकूल,

महाराज राम! रावरी सौं, तेहि छिन ॥ 3 ॥