श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २५६

श्रीराम-स्तुति · पद २५६ / २७९

कहे बिनु रह्यो न परत,कहे राम! रस न रहत।

तुमसे सुसाहिबकी ओट जन खौटो-खरो,

कालकी, करमकी कुसाँसति सहत ॥ १ ॥

करत बिचार सार पैयत न कहूँ कछु,

सकल बड़ाई सब कहाँ ते लहत ?

नाथकी महिमा सुनि, समुझि आपनि ओर,

हेरि हारि कै हहरि हृदय दहत ॥ २ ॥

सखा न, सुसेवक न, सुतिय न, प्रभु आप,

माय-बाप तुही साँचो तुलसी कहत।

मेरी तौ थोरी है, सुधरैगी बिगरियौ,बलि,

राम! रावरी सों, रही रावरी चहत ॥ ३ ॥