श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 257

दीनबंधु! दूरि किये दीनको न दूसरी सरन।

आपको भले हैं सब, आपनेको कोऊ कहूँ,

सबको भलो है राम! रावरो चरन ॥ 1 ॥

पाहन,पसु,पतंग,कोल,भील,निसिचर,

काँच ते कृपानिधान किये सुबरन।

दंडक-पुहुमि पाय परसि पुनीत भई,

उकठे बिटप लागे फूलन-फरन ॥ 2 ॥

पतित-पावन नाम बाम हू दाहिनो, देव!

दुनी न दुसह-दुख-दूषन-दरन।

सीलसिंधु! तोसों ऊँची-नीचियौ कहत सोभा,

तोसो तुही तुलसीको आरति-हरन ॥ 3 ॥