श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 258

जानि पहिचानि मैं बिसारे हौं कृपानिधान!

एतो मान ढीठ हौं उलटि देत खौरि हौं।

करत जतन जासों जोरिबे को जोगीजन,

तासों क्योंहू जुरी, सो अभागो बैठो तोरि हौं ॥ 1 ॥

मोसो दोस-कोसको भुवन-कोस दूसरो न,

आपनी समुझि सूझि आयो टकटोरि हौं।

गाड़ीके स्वानकी नाईं,माया मोहकी बड़ाई,

छिनहिं तजत, छिन भजत बहोरि हौं ॥ 2 ॥

बड़ो साईं-द्रोही न बराबरी मेरीको कोऊ,

नाथकी सपथ किये कहत करोरि हौं।

दूरि कीजै द्वारतें लबार लालची प्रपंची,

सुधा-सो सलिल सूकरी ज्यों गहडोरिहौं ॥ 3 ॥

राखिये नीके सुधारि, नीचको डारिये मारि,

दुहूँ ओरकी बिचारि, अब न निहोरिहौं।

तुलसी कही है साँची रेख बार बार खाँची,

ढील किये नाम-महिमाकी नाव बोरिहौं ॥ 4 ॥