श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २५९

श्रीराम-स्तुति · पद २५९ / २७९

रावरी सुधारी जो बिगारी बिगरैगी मेरी,।

कहौं,बलि,बेदकी न लोक कहा कहैगो ?

प्रभुको उदास-भाउ, जनको पाप-प्रभाउ,

दुहूँ भाँति दीनबन्धु ! दीन दुख दहैगो ॥ १ ॥

मैं तो दियो छाती पबि,लयो कलिकाल दबि,

साँसति सहत,परबस को न सहैगो ?

बाँकी बिरुदावली बनैगी पाले ही कृपालु !

अंत मेरो हाल हेरि यौं न मन रहैगो ॥ २ ॥

करमी-धरमी, साधु-सेवक, बिरत-रत,

आपनी भलाई थल कहाँ कौन लहैगो ?

तेरे मुँह फेरे मोसे कायर-कपूत-कूर,

लटे लटपटेनि को कौन परिगहैगो ? ॥ ३ ॥

काल पाय फिरत दसा दयालु ! सबहीकी,

तोहि बिनु मोहि कबहूँ न कोऊ चहैगो।

बचन-करम-हिये कहौं राम ! सौंह किये,

तुलसी पै नाथके निबाहेई निबहैगो ॥ ४ ॥