पद २६१
श्रीराम-स्तुति · पद २६१ / २७९
मेरी न बनै बनाये मेरे कोटि कलप लौं,
राम !रावरे बनाये बनै पल पाउ मैं।
निपट सयाने हौ कृपानिधान ! कहा कहौं ?
लिये बेर बदलि अमोल मनि आउ मैं ॥ १ ॥
मानस मलीन,करतब कलिमल पीन,
जीह हू न जप्यो नाम,बक्यो आउ-बाउ मैं।
कुपथ कुचाल चल्यो, भयो न भूलिहू भलो,
बाल-दसा हू न खेल्यो खेलत सुदाउ मैं ॥ २ ॥
देखा-देखी दंभ तें कि संग तें भई भलाई,
प्रकटि जनाई, कियो दुरित-दुराउ मैं।
दोष
राग रोष—- पोषे, गोगन समेत मन,
द्वेष
इनकी भगति कीन्ही इनही को भाउ मैं ॥ ३ ॥
आगिली-पाछिली, अबहूँकी अनुमान ही तें,
बूझियत गति, कछु कीन्हों तो न काउ मैं।
जग कहै रामकी प्रतीति-प्रीति तुलसी हू,
झूठे -साँचे आसरो साहब रघुराउ मैं ॥ ४ ॥