श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २६२

श्रीराम-स्तुति · पद २६२ / २७९

कह्यो न परत,बिनु कहे न रह्यो परत,

बड़ो सुख कहत बड़े सों,बलि,दीनता।

प्रभुकी बड़ाई बड़ी,आपनी छोटाई छोटी,

प्रभुकी पुनीतता, आपनी पाप-पीनता ॥ १ ॥

दुहू ओर समुझि सकुचि सहमत मन,

सनमुख होत सुनि स्वामी-समीचीनता।

नाथ-गुनगाथ गाये,हाथ जोरि माथ नाये,

नीचऊ निवाजे प्रीति-रीतिकी प्रबीनता ॥ २ ॥

एही दरबार है गरब तें सरब-हानि,

लाभ जोग-छेमको गरीबी-मिसकीनता।

मोटो दसकंध सो न दूबरो बिभीषण सो,

बूझि परी रावरेकी प्रेम-पराधीनता ॥ ३ ॥

यहाँकी सयानप,अयानप सहस सम,

सूधौ सतभाय कहे मिटति मलीनता।

गीध-सिला-सबरीकी सुधि सब दिन किये,

होइगी न साई सों सनेह-हित-हीनता ॥ ४ ॥

सकल कामना देत नाम तेरो कामतरु,

सुमिरत होत कलिमल-छल-छीनता।

करुनानिधान ! बरदान तुलसी चहत,

सीतापति-भक्ति-सुरसरि-नीर-मीनता ॥ ५ ॥