श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २६३

श्रीराम-स्तुति · पद २६३ / २७९

नाथ नीके कै जानिबी ठीक जन-जीयकी।

रावरो भरोसो नाह कै सु-प्रेम-नेम लियो,

रुचिर रहनि रुचि मति गति तीयकी ॥ १ ॥

कुकृत-सुकृत बस सब ही सों संग पर्यो,

परखी पराई गति, आपने हूँ कीयकी।

मेरे भलेको गोसाई ! पोचको,न सोच-संक,

हौंहुँ किये कहौं सौंह साँची सीय-पीयकी ॥ २ ॥

ग्यानहू-गिराके स्वामी,बाहर-अंतरजामी,

यहाँ क्यों दुरैगी बात मुखकी औ हीयकी ?

तुलसी तिहारो,तुमहीं पै तुलसीके हित,

राखि कहौं हौं तो जो पै व्हहौ माखी घीयकी ॥ ३ ॥