पद 264
श्रीराम-स्तुति · पद 264 / 279
मेरो कह्यो सुनि पुनि भावै तोहि करि सो।
चारिहू बिलोचन बिलोकु तू तिलोक महँ,
तेरो तिहु काल कहु को है हितू हरि-सो ॥ 1 ॥
नये-नये नेह अनुभये देह-गेह बसि,
परखे प्रंपंची प्रेम, परत उघरि सो।
सुहृद-समाज दगाबाजिहीको सौदा-सूत,
जब जाको काज तब मिलै पाँय परि सो ॥ 2 ॥
बिबुध सयाने, पहिचाने कैधौं नाहीं नीके ,
देत एक गुन, लेत कोटि गुन भरि सो।
करम-धरम श्रम-फल रघुबर बिनु,
राखको सो होम है, ऊसर कैसो बरिसो ॥ 3 ॥
आदि-अंत-बीच भलो भलो करै सबहीको,
जाको जस लोक-बेद रह्यो है बगरि-सो।
सीतापति सारिखो न साहिब सील-निधान,
कैसे कल परै सठ! बैठो सो बिसरि-सो ॥ 4 ॥
जीवको जीवन-प्रान, प्रानको परम हित,
प्रीतम,पुनीतकृत नीचन निदरि सो।
तुलसी! तोको कृपालु जो कियो कोसलपालु,
चित्रकूटको चरित्र चेतु चित करि सो ॥ 5 ॥