श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 264

मेरो कह्यो सुनि पुनि भावै तोहि करि सो।

चारिहू बिलोचन बिलोकु तू तिलोक महँ,

तेरो तिहु काल कहु को है हितू हरि-सो ॥ 1 ॥

नये-नये नेह अनुभये देह-गेह बसि,

परखे प्रंपंची प्रेम, परत उघरि सो।

सुहृद-समाज दगाबाजिहीको सौदा-सूत,

जब जाको काज तब मिलै पाँय परि सो ॥ 2 ॥

बिबुध सयाने, पहिचाने कैधौं नाहीं नीके ,

देत एक गुन, लेत कोटि गुन भरि सो।

करम-धरम श्रम-फल रघुबर बिनु,

राखको सो होम है, ऊसर कैसो बरिसो ॥ 3 ॥

आदि-अंत-बीच भलो भलो करै सबहीको,

जाको जस लोक-बेद रह्यो है बगरि-सो।

सीतापति सारिखो न साहिब सील-निधान,

कैसे कल परै सठ! बैठो सो बिसरि-सो ॥ 4 ॥

जीवको जीवन-प्रान, प्रानको परम हित,

प्रीतम,पुनीतकृत नीचन निदरि सो।

तुलसी! तोको कृपालु जो कियो कोसलपालु,

चित्रकूटको चरित्र चेतु चित करि सो ॥ 5 ॥