पद 265
श्रीराम-स्तुति · पद 265 / 279
तन सुचि,मनरुचि, मुख कहौं ’जन हौं सिय-पीको’।
केहि अभाग जान्यो नहिं, जो न होइ नाथ सों नातो-नेह न नीको ॥ 1 ॥
जल चाहत पावक लहौं, बिष होत अमीको।
कलि-कुचाल संतनि कही सोइ सही, मोहि कछु फहम न तरनि तमीको ॥ 2 ॥
जानि अंध अंजन कहै बन-बाघिनी-घीको।
सुनि उपचार बिकारको सुबिचार करौं जब, तब बुधि बल हरै हीको ॥ 3 ॥
प्रभु सों कहत सकुचात हौं, परौं जनि फिरि फीको।
निकट बोलि,बलि,बरजिये,परिहरै ख्याल अब तुलसिदास जड़ जीको ॥ 4 ॥