श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 265

तन सुचि,मनरुचि, मुख कहौं ’जन हौं सिय-पीको’।

केहि अभाग जान्यो नहिं, जो न होइ नाथ सों नातो-नेह न नीको ॥ 1 ॥

जल चाहत पावक लहौं, बिष होत अमीको।

कलि-कुचाल संतनि कही सोइ सही, मोहि कछु फहम न तरनि तमीको ॥ 2 ॥

जानि अंध अंजन कहै बन-बाघिनी-घीको।

सुनि उपचार बिकारको सुबिचार करौं जब, तब बुधि बल हरै हीको ॥ 3 ॥

प्रभु सों कहत सकुचात हौं, परौं जनि फिरि फीको।

निकट बोलि,बलि,बरजिये,परिहरै ख्याल अब तुलसिदास जड़ जीको ॥ 4 ॥