श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २६६

श्रीराम-स्तुति · पद २६६ / २७९

ज्यों ज्यों निकट भयो चहौं कृपालु! त्यों त्यों दूरि पर्यो हौं।

तुम चहुँ जुग रस एक राम! हौं हूँ रावरो, जदपि अघ अवगुननि भर्यो हौं ॥

बीच पाइ एहि नीच बीच ही छरनि छर्यो हौं।

हौं सुबरन कुबरन कियो, नृपतें भिखारि करि, सुमतितें कुमति कर्यो हौं ॥ २ ॥

अगनित गिरि-कानन फिरयो, बिनु आगि जर्यो हौं।

चित्रकूट गये हौं लखि कलिकी कुचालि सब, अब अपडरनि डर्यो हौं ॥ ३ ॥

माथ नाइ नाथ सों कहौं, हात जोरि खर्यो हौं।

चीन्हों चोर जिय मारिहै तुलसी सो कथा सुनि प्रभुसों गुदरि निबर्यो हौं ॥ ४ ॥