पद 267
श्रीराम-स्तुति · पद 267 / 279
पन करि हौं हठि आजुतें रामद्वार पर्यो हौं।
’तू मेरो’यह बिन कहे उठिहौ न जनमभरि, प्रभुकी सौकरि निर्यो हौं ॥ 1 ॥
दै दै धक्का जमभट थके , टारे न टर्यो हौं।
उदर दुसह साँसति सही बहुबार जनमि जग, नरकनिदरि निकर्यो हौं ॥ 2 ॥
हौं मचला लै छाड़िहौं, जेहि लागि अर्यो हौं।
तुम दयालु,बनिहै दिये,बलि,बिलँब न कीजिये, जात गलानि गर्यौ हौं ॥ 3 ॥
प्रगट कहत जो सकुचिये, अपराध-भर्यो हौं।
तौ मनमें अपनाइये, तुलसीहि कृपा करि, कलि बिलोकि हहर्यो हौं ॥ 4 ॥