श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २६८

श्रीराम-स्तुति · पद २६८ / २७९

तुम अपनायो तब जानिहौं,जब मन फिरि परिहै।

जेहि सुभाव बिषयनि लग्यो, तेहि सहज नाथ सौं नेह छाड़ि छल करिहै ॥ १ ॥

सुतकी प्रीति,प्रतीति मीतकी, नृप ज्यों डर डरिहै।

अपनो सो स्वारथ स्वामिसों, चहुँ बिधि चातक ज्यों एक टेकते नहिं टरिहै ॥ २ ॥

हरषिहै न अति आदरे, निदरे न जरि मरिहै।

हानि-लाभ दुख-सुख सबै समचित हित-अनहित,कलि-कुचालि परिहरिहै ॥ ३ ॥

प्रभु-गुन सुनि मन हरषिहै, नीर नयननि ढरिहै।

तुलसिदास भयो रामको बिस्वास,प्रेम लखि आनँद उमगि उर भरिहै ॥ ४ ॥