श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 269

राम कबहुँ प्रिय लागिहौ जैसे नीर मीनको?

सुख जीवन ज्यों जीवको, मनि ज्यों फनिको हित, ज्यों धन लोभ-लीनको ॥ 1 ॥

ज्यों सुभाय प्रिय लगति नागरी नागर नवीनको।

त्यों मेरे मन लालसा करिये करुनाकर! पावन प्रेम पीनको ॥ 2 ॥

मनसाको दाता कहैं श्रुति प्रभु प्रबीनको।

तुलसिदासको भावतो,बलि जाउँ दयानिधि! दीजे दान दीनको ॥ 3 ॥