श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 271

जैसो हौं तैसो राम रावरो जन, जनि परिहरिये।

कृपासिंधु,कोसलधनी! सरनागत-पालक, ढरनि आपनी ढरिये ॥ 1 ॥

हौं तौ बिगरायल और को, बिगरो न बिगरिये।

तुम सुधारि आये सदा सबकी सबही बिधि, अब मेरियो सुधरिये ॥ 2 ॥

जग हँसिहै मेरे संग्रहे, कत इहि डर डरिये।

कपि-केवट कीन्हे सखा जेहि सील,सरल चित, तेहि सुभाउ अनुसरिये ॥ 3 ॥

अपराधी तउ आपनो, तुलसी न बिसरिये।

टूटियो बाँह गरे परै, फूटेहु बिलोचन पीर होत हित करिये ॥ 4 ॥